भूतिया कुआं डरावनी कहानी की शुरुआत किसी अफ़वाह या किसी बुज़ुर्ग की डराने वाली बात से नहीं हुई थी। इसकी शुरुआत एक साधारण से सवाल से हुई थी, जो मैंने गाँव में कदम रखते ही पूछ लिया था। “यह कुआँ ढका क्यों रखा है?” मेरे इस सवाल के बाद कुछ सेकंड तक कोई नहीं बोला। जैसे मैंने कुछ ऐसा पूछ लिया हो, जो नहीं पूछना चाहिए था।
मैं अपने काम के सिलसिले में शहर से दूर एक छोटे से गाँव में आया था। यह इलाका काग़ज़ों में तो सामान्य दिखता था, लेकिन यहाँ की हवा में कुछ अजीब था। लोग कम बोलते थे, जल्दी घरों में घुस जाते थे और शाम ढलते ही पूरा गाँव जैसे साँस रोक लेता था। गाँव के बीचों-बीच एक पुराना कुआँ था, जिसके चारों ओर पत्थरों की ऊँची मेड़ बनी हुई थी और ऊपर से भारी लकड़ी के तख्तों से उसे ढक दिया गया था। उस पर जंग लगी ज़ंजीर और ताला लगा हुआ था, मानो किसी चीज़ को बाहर आने से रोका जा रहा हो।
मेरे सवाल के बाद गाँव के प्रधान ने बस इतना कहा, “पुराना कुआँ है, इस्तेमाल के लायक नहीं।” उनकी आवाज़ में सख़्ती थी, लेकिन आँखों में डर छिपा हुआ था। उसी वक्त एक बूढ़ी औरत ने धीमी आवाज़ में कहा, “रात में उधर मत जाना।” किसी ने उसे डाँट कर चुप करा दिया। मुझे तभी समझ आ गया था कि यह कोई साधारण भूतिया कहानी नहीं है।
पहली रात मैं गाँव के बाहर बने पुराने सरकारी गेस्टहाउस में रुका। इमारत जर्जर थी, लेकिन रहने लायक। रात का खाना जल्दी खा लिया गया और नौ बजे तक पूरा इलाका शांत हो गया। मैं बिस्तर पर लेटा हुआ था, खिड़की से बाहर अंधेरे को देख रहा था। गाँव की तरफ़ से हल्की हवा चल रही थी, जो अपने साथ मिट्टी और सड़े पत्तों की गंध ला रही थी।
ठीक रात के बारह बजे मेरी नींद खुल गई। बाहर से किसी के रोने जैसी आवाज़ आ रही थी। पहले मुझे लगा कोई बच्चा रो रहा है, लेकिन आवाज़ में वह मासूमियत नहीं थी। वह रोना खिंचा हुआ था, जैसे कोई बहुत देर से रोते-रोते थक चुका हो। आवाज़ साफ़ नहीं थी, लेकिन दिशा एक ही थी – गाँव के बीचों-बीच वाला कुआँ।
मैं उठकर खिड़की के पास गया। दूर अंधेरे में मुझे कुछ दिखाई नहीं दिया, लेकिन रोने की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी। कुछ मिनट बाद आवाज़ अपने आप बंद हो गई। उस रात मैं ठीक से सो नहीं पाया।
अगली सुबह मैंने गाँव के एक स्कूल शिक्षक, रमेश, से बात की। मैंने सीधे कुएँ की बात नहीं की, बस यूँ ही पूछा कि यहाँ रात में बच्चे क्यों नहीं बाहर होते। उसने मेरी तरफ़ देखा और कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, “यहाँ बच्चे जल्दी बड़े हो जाते हैं।” उसके इस जवाब ने मुझे असहज कर दिया।
दूसरी रात आवाज़ फिर आई। इस बार सिर्फ़ रोना नहीं था। इस बार हँसी भी थी। बच्चों की हँसी। बहुत धीमी, बहुत दूर से आती हुई। हँसी और रोना एक साथ सुनाई दे रहा था, जैसे कई बच्चे एक साथ कुएँ के अंदर से बोल रहे हों। मेरे रोंगटे खड़े हो गए। कोई भी सामान्य इंसान यह मानने को तैयार नहीं होगा कि आधी रात में कुएँ से बच्चों की आवाज़ आ सकती है, लेकिन मैं साफ़ सुन रहा था।
तीसरे दिन मैंने ज़ोर देकर कुएँ के बारे में पूछा। इस बार प्रधान ने मुझे साफ़ मना कर दिया। उन्होंने कहा कि यह गाँव की निजी ज़मीन है और वहाँ जाना मना है। लेकिन डर की वजह सिर्फ़ यही नहीं थी। शाम को एक बूढ़े आदमी ने मुझे अलग बुलाया। उसकी आवाज़ काँप रही थी। उसने कहा कि अगर मैं अपनी जान प्यारी समझता हूँ, तो उस कुएँ के पास कभी न जाऊँ।
उसने बताया कि लगभग बीस साल पहले गाँव में भयानक सूखा पड़ा था। पानी की कमी के कारण लोग परेशान थे। उसी समय गाँव के कुछ बच्चों का एक-एक करके गायब होना शुरू हुआ। पहले किसी ने ध्यान नहीं दिया। सबने सोचा बच्चे खेलते-खेलते कहीं चले गए होंगे। लेकिन जब पाँच बच्चे गायब हो गए, तब गाँव में डर फैल गया। कई दिनों की तलाश के बाद एक बच्चे की चप्पल कुएँ के पास मिली। जब कुएँ में झाँका गया, तो नीचे से बच्चों की चीखें सुनाई दीं। लेकिन जब रस्सी डालकर देखा गया, तो कुएँ में सिर्फ़ पानी था। कोई बच्चा नहीं।
कहा जाता है कि उस रात गाँव के कुछ लोगों ने कुएँ में कुछ देखा था। कुछ ऐसा, जो बच्चों को पानी के नीचे खींच लेता था। अगले ही दिन बच्चों की आवाज़ें बंद हो गईं। लेकिन उसके बाद से, हर साल उसी समय, रात में कुएँ से बच्चों के रोने और हँसने की आवाज़ आने लगी।
उस रात मैं खुद को रोक नहीं पाया। मैं चुपचाप गेस्टहाउस से निकला और कुएँ की तरफ़ चल पड़ा। पूरा गाँव सोया हुआ था। चाँद बादलों के पीछे छिपा था। जैसे ही मैं कुएँ के पास पहुँचा, हवा अचानक ठंडी हो गई। तख्तों के नीचे से बहुत धीमी आवाज़ आ रही थी। यह फुसफुसाहट थी। बच्चों की आवाज़ें, एक-दूसरे को बुलाती हुई।
मैंने ज़ंजीर को छुआ। वह बर्फ़ जैसी ठंडी थी। उसी पल नीचे से किसी ने मेरा नाम लिया। मेरी साँस अटक गई। मैंने कभी किसी को अपना नाम नहीं बताया था। फिर भी आवाज़ साफ़ थी। कई आवाज़ें एक साथ मेरा नाम पुकार रही थीं। मैं पीछे हटने लगा, लेकिन पैर जैसे ज़मीन से चिपक गए हों।
तख्तों के नीचे से एक हाथ बाहर आया। छोटा, सड़ा हुआ, जैसे कई दिनों से पानी में पड़ा हो। फिर दूसरा हाथ। और फिर बच्चों की हँसी तेज़ हो गई। मुझे ऐसा लगा जैसे कुआँ मुझे अंदर खींच रहा हो। किसी तरह मैंने खुद को संभाला और भागकर गेस्टहाउस लौट आया।
अगली सुबह गाँव में हंगामा मच गया। प्रधान को पता चल गया था कि मैं कुएँ तक गया था। उन्होंने मुझसे तुरंत गाँव छोड़ने को कहा। जाते समय बूढ़े आदमी ने बस इतना कहा, “अब उन्होंने तुम्हें देख लिया है।”
मैं शहर लौट आया, लेकिन कहानी वहीं खत्म नहीं हुई। आज भी कई रातों में मुझे नींद में पानी टपकने की आवाज़ सुनाई देती है। कभी-कभी बच्चों की हँसी। और कभी-कभी कोई आवाज़ मेरे कान में फुसफुसाकर मेरा नाम लेती है। अब मुझे समझ आ गया है कि वह भूतिया कुआँ सिर्फ़ उस गाँव में नहीं था। वह मेरे साथ चला आया है।
(नोट– दी गई कहानी काल्पनिक है, इसका किसी भी जीवित या निर्जीव वस्तु से कोई संबंध नहीं है। हमारा उद्देश्य अंधश्रद्धा फैलाना नहीं है, यह केवल मनोरंजन के उद्देश्य से बनायी गयी है।)