Shamshan ki darawani kahani की शुरुआत उस पल से हुई, जब श्मशान की आग बुझ चुकी थी लेकिन डर अभी ज़िंदा था।
गाँव के बाहर फैला वह श्मशान दिन में भी डरावना लगता था, और उस रात तो अँधेरा ऐसा था जैसे आसमान ने आँखें मूँद ली हों। बादल इतने नीचे झुके थे कि लगता था हाथ बढ़ाओ तो छू लो। चिता की लकड़ियाँ अभी भी सुलग रही थीं। उनसे उठता धुआँ हवा में नहीं घुल रहा था, बल्कि ज़मीन के पास ही तैर रहा था, जैसे किसी ने रास्ता घेर लिया हो।
हरिराम की मौत अचानक हुई थी। किसी बीमारी की बात कही गई, लेकिन गाँव में सब जानते थे कि उसकी मौत सामान्य नहीं थी। अंतिम संस्कार आधी रात के बाद हुआ। कोई ज़ोर से रोया नहीं। कोई देर तक रुका नहीं। सब जल्दी-जल्दी लौट जाना चाहते थे।
मैं सबसे पीछे रह गया।
जैसे ही मैं श्मशान के फाटक से बाहर निकला, मुझे लगा किसी ने पीछे से मेरा नाम लिया। बहुत धीमी आवाज़ थी, लेकिन बिल्कुल साफ़।
मैंने पलटकर देखा।
चिता के पास कोई खड़ा था।
वही आकृति, जो कुछ मिनट पहले वहाँ नहीं थी। लम्बा शरीर, झुका हुआ सिर और जलती लकड़ियों की रोशनी में चमकती आँखें। वह इंसान नहीं लग रहा था। उसकी परछाईं आग की उल्टी दिशा में पड़ रही थी।
मेरे हाथ-पैर ठंडे पड़ गए।
मैंने तेज़ चलना शुरू किया।
श्मशान से गाँव तक जाने वाला रास्ता संकरा था। दोनों तरफ़ घना जंगल। हवा जब पेड़ों से टकराती, तो ऐसा लगता जैसे कोई हँस रहा हो। मेरे कदमों की आवाज़ अजीब तरह से लौटकर आ रही थी, जैसे कोई मेरे पीछे बिल्कुल उसी चाल से चल रहा हो।
कुछ दूर जाने के बाद मुझे फिर महसूस हुआ—
मैं अकेला नहीं हूँ।
मुझे किसी के साँस लेने की आवाज़ सुनाई दे रही थी। भारी, धीमी और बिल्कुल मेरे कान के पास।
मैंने रुकने की हिम्मत नहीं की।
तभी मेरे सामने रास्ते पर कुछ गिरा दिखा।
एक कंगन।
वही कंगन जो हरिराम की पत्नी उसकी चिता पर रखकर आई थी।
मेरे दिल की धड़कन रुक गई।
मैंने कंगन उठाने के लिए झुकने की गलती कर दी।
उसी पल किसी ने मेरे कान के पास फुसफुसाकर कहा,
“इसे मत छुओ।”
मैं उछलकर पीछे हटा। कोई नहीं था। लेकिन कंगन अपने आप रास्ते के बीच से सरककर झाड़ियों में चला गया।
मेरी साँसें तेज़ हो गईं।
मैंने आगे बढ़ना शुरू किया, लेकिन अब रास्ता बदल चुका था। जो मोड़ सीधे गाँव की तरफ़ जाता था, वह गायब था। पेड़ और पास आ गए थे। अँधेरा गाढ़ा हो गया था।
तभी मुझे बच्चों के रोने की आवाज़ सुनाई दी।
पहले एक बच्चा।
फिर दो।
फिर दर्जनों।
आवाज़ें हर दिशा से आ रही थीं। कुछ मेरे पीछे से, कुछ झाड़ियों के अंदर से। लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि वे रोने के साथ-साथ हँस भी रहे थे।
मेरे सिर में तेज़ दर्द होने लगा। आँखों के सामने अजीब-अजीब तस्वीरें आने लगीं। मुझे लगा जैसे कोई मेरी यादों को खुरच रहा हो।
अचानक रास्ते के बीच एक आदमी खड़ा दिखा।
सफ़ेद कपड़े। जले हुए हाथ। और चेहरा ऐसा, जैसे आग से अभी-अभी निकाला गया हो।
वह हरिराम था।
उसकी आँखें खुली थीं। मुँह से धुआँ निकल रहा था। उसके पैरों के नीचे ज़मीन काली पड़ रही थी।
उसने अपना हाथ मेरी तरफ़ बढ़ाया।
मैं पीछे हटने लगा, लेकिन मेरे पैर ज़मीन में धँस गए। जैसे किसी ने पकड़ लिया हो।
तभी मेरे पीछे से बहुत सारी उँगलियाँ मेरे टखनों को छूने लगीं।
मैंने नीचे देखा।
मिट्टी के अंदर से हाथ निकल रहे थे।
सैकड़ों हाथ।
वे मेरे पैरों को पकड़ रहे थे, खींच रहे थे, जैसे मुझे नीचे ले जाना चाहते हों।
मैं ज़ोर से चीखा।
उसी पल किसी ने मेरे माथे पर ज़ोर से फूँक मारी।
सब कुछ अचानक रुक गया।
मैं ज़मीन पर गिर पड़ा था। मेरे सामने गाँव का पुजारी खड़ा था। उसका चेहरा पसीने से भीगा हुआ था।
उसने बिना कुछ कहे मुझे उठाया और तेज़ी से चलने का इशारा किया।
हम चलते रहे। पीछे मुड़कर नहीं देखा।
गाँव पहुँचने के बाद उसने बताया कि श्मशान से लौटते समय जो सबसे पीछे रह जाता है, वह सबसे पहले दिखाई देता है। आत्माएँ उसे अपना रास्ता समझ लेती हैं।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
उस रात के बाद से मेरे शरीर पर जलने के निशान दिखने लगे। सपनों में वही रास्ता, वही हाथ, वही आवाज़ें आने लगीं।
और सबसे डरावनी बात यह थी कि अब कभी-कभी आधी रात को मेरे पैरों में मिट्टी लग जाती है।
जैसे मैं नींद में श्मशान तक जाकर लौट आता हूँ।
Shamshan ki darawani kahani अभी ज़िंदा है।
(नोट– दी गई कहानी काल्पनिक है, इसका किसी भी जीवित या निर्जीव वस्तु से कोई संबंध नहीं है। हमारा उद्देश्य अंधश्रद्धा फैलाना नहीं है, यह केवल मनोरंजन के उद्देश्य से बनायी गयी है।)