उस रात स्टेशन पर रुकना मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल थी।
अगर मैं चाहता, तो किसी होटल में चला जाता। अगर चाहता, तो किसी जान-पहचान वाले को फ़ोन कर लेता। लेकिन उस समय मुझे लगा कि एक छोटा सा स्टेशन, कुछ घंटे और एक बेंच… इसमें क्या ही हो सकता है।
मैं गलत था।
स्टेशन छोटा था। दो प्लेटफॉर्म, पीली रोशनी और चारों तरफ़ फैला हुआ सन्नाटा। जनवरी की ठंड हड्डियों में उतर रही थी। कोहरा धीरे-धीरे ज़मीन से उठकर प्लेटफॉर्म पर फैल रहा था, जैसे किसी ने सफ़ेद चादर बिछा दी हो।
मेरी ट्रेन छूट चुकी थी। अगली ट्रेन सुबह चार बजे थी। स्टेशन मास्टर का कमरा बंद था। टिकट खिड़की पर ताला लटका था। सिर्फ़ दूर एक बल्ब टिमटिमा रहा था, जो बार-बार बुझने की कोशिश कर रहा था।
मैं लोहे की बेंच पर बैठ गया। बेंच इतनी ठंडी थी कि कुछ ही सेकंड में शरीर सिहर उठा। चारों तरफ़ इतनी ख़ामोशी थी कि अपनी ही साँसें भारी लग रही थीं।
कुछ देर तक सब सामान्य रहा।
फिर मुझे लगा जैसे किसी ने मेरे बहुत पास से गुज़रकर हवा को हिला दिया हो।
मैंने तुरंत सिर उठाया। प्लेटफॉर्म खाली था। लेकिन दिल की धड़कन तेज़ हो चुकी थी। मैंने खुद को समझाया कि यह सिर्फ़ वहम है। रात, ठंड और थकान मिलकर दिमाग़ से खेल कर रहे हैं।
मैं दोबारा बैठ गया।
कुछ ही पल बाद मुझे ज़मीन पर कुछ दिखा।
पैरों के निशान।
नंगे पैरों के।
वे निशान सीधे प्लेटफॉर्म के आख़िरी सिरे की तरफ़ जा रहे थे। मुझे अजीब लगा, क्योंकि इतनी ठंड में कोई नंगे पैर कैसे चल सकता है? और वे निशान ऐसे थे जैसे अभी-अभी बने हों।
मैंने गर्दन उठाकर उसी दिशा में देखा।
वहाँ कोई खड़ा था।
सफ़ेद कपड़ों में एक लड़की। बाल खुले हुए। वह मेरी तरफ़ नहीं देख रही थी। उसकी नज़रें नीचे पटरियों पर जमी थीं। वह बिल्कुल स्थिर खड़ी थी, जैसे कोई मूर्ति।
मैंने पहली बार उसे देखकर सोचा कि शायद उसकी भी ट्रेन छूट गई होगी। लेकिन जितना ज़्यादा देखता गया, उतना ही कुछ गलत लगने लगा। इतनी ठंड में भी वह काँप नहीं रही थी। उसके शरीर में कोई हरकत नहीं थी।
तभी स्टेशन की लाइट अचानक झपकी और एक पल के लिए बुझ गई।
जब लाइट वापस आई, तो मेरे दिल की धड़कन रुकने को हो गई।
वह लड़की अब पहले से ज़्यादा पास खड़ी थी।
मैंने साफ़ देखा, वह चली नहीं थी। जैसे किसी ने उसे एक जगह से उठाकर दूसरी जगह रख दिया हो।
मेरे मुँह से आवाज़ नहीं निकल रही थी। हाथ ठंडे पड़ चुके थे।
तभी मुझे हँसी सुनाई दी।
बहुत धीमी, टूटी हुई।
ऐसी हँसी जो कानों में नहीं, सीधा दिमाग़ में गूँजती है।
मैंने पीछे देखा। कोई नहीं था। लेकिन हँसी अब भी मेरे बहुत पास थी। ऐसा लग रहा था जैसे कोई मेरे ठीक पीछे खड़ा होकर साँस ले रहा हो।
अचानक दूर से ट्रेन की आवाज़ आई। मेरे मन में थोड़ी राहत हुई।
घोषणा हुई कि ट्रेन प्लेटफॉर्म से गुज़रेगी।
मैंने लड़की की तरफ़ देखा। वह अब मेरी ओर देख रही थी।
उसका चेहरा पीला था। आँखें खुली थीं, लेकिन उनमें जीवन नहीं था। और जो बात मुझे सबसे ज़्यादा डराने वाली लगी, वह यह थी कि उसकी परछाईं ज़मीन पर नहीं थी।
उसने बहुत धीमी आवाज़ में पूछा,
“आज अमावस्या है न?”
उस सवाल के साथ ही प्लेटफॉर्म पर लगी घड़ी रुक गई।
मैं जवाब देना चाहता था, लेकिन उसी पल ट्रेन तेज़ आवाज़ के साथ प्लेटफॉर्म से गुज़र गई। शोर इतना ज़्यादा था कि मेरे कानों में दर्द होने लगा।
ट्रेन गुज़र गई।
लेकिन लड़की वहीं थी।
अब वह पटरियों पर खड़ी थी।
तभी किसी ने ज़ोर से मेरा हाथ पकड़ लिया।
मैं चीख पड़ा।
वह चौकीदार था। उसका चेहरा पीला पड़ा हुआ था। आँखों में डर साफ़ दिख रहा था।
“मत देखो,” उसने काँपती आवाज़ में कहा।
उसने मुझे ज़बरदस्ती पीछे खींचा। जैसे ही मैं पलटा, मैंने देखा कि वह लड़की अपना सिर धीरे-धीरे ऊपर उठा रही थी।
और मुस्कुरा रही थी।
उसकी मुस्कान इंसानी नहीं थी।
अगले ही पल वह धुँध की तरह हवा में घुल गई।
चौकीदार ने बताया कि कई साल पहले इसी स्टेशन पर अमावस्या की रात एक लड़की ने ट्रेन के आगे कूदकर जान दे दी थी। तब से हर अमावस्या वह यहाँ दिखाई देती है। जो उसे देख ले, जो उससे बात कर ले, वह डर ज़िंदगी भर नहीं छोड़ता।
मैं सुबह होते ही स्टेशन से निकल आया।
लेकिन आज भी, जब किसी सुनसान स्टेशन पर ठंडी हवा अचानक रुक जाती है, तो मुझे पता चल जाता है—
वह कहीं आस-पास ही है।
(नोट– दी गई कहानी काल्पनिक है, इसका किसी भी जीवित या निर्जीव वस्तु से कोई संबंध नहीं है। हमारा उद्देश्य अंधश्रद्धा फैलाना नहीं है, यह केवल मनोरंजन के उद्देश्य से बनायी गयी है।)